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राजस्थानी भाषा: पहचान, उपयोगिता और वर्तमान समय की माँग

हाल के दिनों में राजस्थानी भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने की माँग ने एक बार फिर तेज़ी पकड़ी है। हालाँकि यह माँग पहले भी विभिन्न व्यक्तियों और संगठनों द्वारा अलग-अलग स्तरों पर उठाई जाती रही है, लेकिन इस बार यह एक संगठित राज्य स्तरीय गतिविधि  के रूप में सामने आई है। इस गतिविधि में अभी तक राजनीतिक दलों की कोई सक्रिय और सामूहिक भागीदारी स्पष्ट रूप से देखने को नहीं मिली है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर सभी प्रमुख दलों के नेताओं ने—चाहे विधानसभा के भीतर हों या बाहर—इस विषय पर अपने विचार प्रकट किए हैं और सरकार की स्थिति को भी समझने का प्रयास किया है। किसी न किसी रूप में यह विषय पूरे राजस्थान में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कुछ लोग राजस्थानी को आधिकारिक भाषा बनाए जाने के पक्ष में हैं, तो कुछ इसके विरोध में भी तर्क दे रहे हैं। मीडिया और बौद्धिक जगत में भी इस मुद्दे को लेकर गहन विचार-विमर्श चल रहा है।

भाषा बनाम बोली एवम भौगोलिक विविधता का तर्क

विरोध के पक्ष में एक प्रमुख तर्क यह दिया जाता है कि राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है, बल्कि यह केवल बोलियों का एक समूह है। वहीं दूसरी ओर, समर्थकों का कहना है कि राजस्थानी एक समृद्ध और ऐतिहासिक भाषा है, जिसका अस्तित्व केवल मारवाड़ी तक सीमित नहीं है। इसका एक विस्तृत साहित्यिक इतिहास रहा है, और यह भाषा लंबे समय तक राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों के आपसी संवाद का माध्यम रही है। इतिहास के पन्नों में राजस्थानी साहित्य और लोकसंस्कृति की स्पष्ट उपस्थिति है, जो यह सिद्ध करती है कि इसका उपयोग केवल बोलचाल तक सीमित न होकर सामाजिक चेतना और मार्गदर्शन में भी होता रहा है।

दूसरा मुख्य तर्क यह है कि जिसे राजस्थानी कहा जा रहा है, वह मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान की भाषा है—विशेषकर मारवाड़ी—और राज्य के अन्य क्षेत्रों में यह भाषा न तो बोली जाती है और न ही आसानी से समझी जाती है। इस आधार पर कुछ लोग इसे समूचे राज्य की भाषा मानने पर आपत्ति जताते हैं।

इस तर्क के उत्तर में यह कहा जाता है कि राजस्थानी भाषा में कई उपभाषाएँ या बोलियाँ शामिल हैं—जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, शेखावाटी, ढूँढाड़ी आदि। दुर्भाग्यवश, राज्य के कुछ हिस्सों में स्थानीय बोलियों का प्रयोग समय के साथ कम होता गया है, जबकि पश्चिमी राजस्थान में मारवाड़ी अभी भी सक्रिय रूप से बोली जाती है। इसलिए यह कहना अनुचित होगा कि राजस्थानी केवल एक क्षेत्र विशेष की भाषा है। बल्कि यह पूरे राजस्थान की सांस्कृतिक और भाषिक पहचान को समेटे हुए एक छत्र अवधारणा है।

मेरा दृष्टिकोण: वर्तमान उपयोगिता पर केंद्रित

मेरा मत न तो इस बात पर केंद्रित है कि राजस्थानी एक स्वतंत्र भाषा है या नहीं, और न ही इस पर कि क्या इसे केवल मारवाड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। मेरा दृष्टिकोण इसकी वर्तमान उपयोगिता पर आधारित है।

भाषा का मूल उद्देश्य संवाद है, लेकिन इसका संबंध केवल शब्दों के आदान-प्रदान से नहीं होता; यह किसी व्यक्ति, समाज और क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान से भी गहराई से जुड़ा होता है। भाषा न केवल लोगों के बीच विचारों को साझा करने का माध्यम होती है, बल्कि शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक प्रसार में भी इसकी केंद्रीय भूमिका होती है।

तकनीकी विकास और वैश्वीकरण से पहले, लोगों का सामाजिक और व्यावसायिक जुड़ाव सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित रहता था। लेकिन वर्तमान समय में स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज व्यक्ति राज्य और देश की सीमाओं से आगे निकलकर वैश्विक स्तर पर संवाद कर रहा है। वैश्वीकरण के प्रभाव से विभिन्न देशों के बीच आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक संबंधों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ अब दुनिया भर के देशों में व्यापार कर रही हैं और इसके साथ ही नौकरियों और मानव संसाधनों का आदान-प्रदान भी तेज़ी से बढ़ा है।

ऐसे में भाषाओं के एकीकरण की आवश्यकता महसूस की गई, ताकि अलग-अलग भाषाओं के लोगों के बीच प्रभावी संवाद संभव हो सके। इसी ज़रूरत के चलते, अंग्रेज़ी भाषा ने अंतरराष्ट्रीय संवाद के एक प्रमुख माध्यम के रूप में स्वयं को स्थापित कर लिया है। अंग्रेज़ी को आज भले ही औपचारिक रूप से सभी देशों में आधिकारिक दर्जा प्राप्त न हो, लेकिन व्यवहार में यह एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में व्यापक स्वीकृति प्राप्त कर चुकी है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी इसी प्रकार की स्थिति देखने को मिलती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में, जहाँ हर राज्य की अपनी मातृभाषा है, वहां आपसी संवाद के लिए हिन्दी या अंग्रेज़ी को प्राथमिकता दी जाती है। यह एक सांस्कृतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और आर्थिक दृष्टिकोण से उठाया गया कदम है।

शिक्षा और रोजगार में भाषा की भूमिका

शिक्षा के क्षेत्र में भी यह प्रवृत्ति साफ़ दिखाई देती है। विशेष रूप से तकनीकी और उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी भाषा का दबदबा बढ़ता जा रहा है। देश के प्रमुख तकनीकी और व्यावसायिक संस्थान—जैसे आईआईटी, आईआईएम आदि—अंग्रेज़ी को ही माध्यम के रूप में प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि आज की पीढ़ी को अंग्रेज़ी में दक्षता एक आवश्यकता के रूप में स्वीकार करनी पड़ी है, न कि किसी प्रचार अभियान के चलते। यह बात केवल अंग्रेज़ी तक सीमित नहीं है। हिन्दी भाषा की भी इसी प्रकार उपयोगिता को लेकर चुनौती सामने आ रही है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी अब अंग्रेज़ी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, क्योंकि अंग्रेज़ी को शिक्षा और रोजगार में अधिक उपयोगी और व्यावहारिक माना जा रहा है। परिणामस्वरूप, हिन्दी को अपने ही क्षेत्र में उपयोगिता के स्तर पर संघर्ष करना पड़ रहा है।

यह पूरी स्थिति हमें यह समझने की ओर ले जाती है कि भाषा केवल सांस्कृतिक पहचान या पारंपरिक संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि उसका मूल्य उसकी वर्तमान उपयोगिता में निहित है। यदि कोई भाषा समय के साथ अपनी उपयोगिता बनाए नहीं रख पाती—चाहे वह शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, या संचार के क्षेत्र में हो—तो वह धीरे-धीरे अपने व्यवहारिक प्रयोग से बाहर होती जाती है।

भाषा केवल पहचान नहीं, उपयोगिता भी है — जो भाषा समय के साथ संवाद, शिक्षा और रोजगार में पीछे छूट जाती है, उसे संरक्षित तो किया जाना चाहिए, लेकिन थोपना नहीं चाहिए।

राजस्थानी भाषा भी आज इसी प्रकार की चुनौती का सामना कर रही है। इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन वर्तमान संदर्भ में इसकी उपयोगिता सीमित होती जा रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि राजस्थानी भाषा का प्रयोग आज भी मुख्यतः बोलचाल तक ही सीमित है, जबकि शिक्षा, प्रशासन और तकनीकी संवाद में इसका प्रयोग लगभग नगण्य है।

राजस्थान के अधिकाश युवा अब राजस्थानी भाषा को न तो पढ़ पाते हैं, न ही समझ पाते हैं, और न ही इसका प्रयोग अपने दैनिक संवाद में करते हैं। यह राजस्थानी भाषा वर्तमान सच्चाई हैं। ऐसे में राजस्थानी को राजस्थान की आधिकारिक भाषा बनाए जाने की माँग एक अव्यावहारिक कदम साबित हो सकता है। यदि किसी भाषा की वर्तमान उपयोगिता सीमित है, तो उसे औपचारिक और प्रशासनिक स्तर पर सभी पर थोपना न केवल अव्यावहारिक होगा, बल्कि यह एक तरह की ज़बरदस्ती होगी। यह निर्णय न केवल सामाजिक असंतुलन पैदा कर सकता है, बल्कि राज्य के भीतर भाषाई और क्षेत्रीय मतभेदों को भी जन्म दे सकता है।

क्या इसका मतलब यह है कि हमें राजस्थानी को पूरी तरह नकार देना चाहिए?

परिवर्तन संसार का नियम है। समय और परिस्थिति के अनुसार समाज, व्यक्ति और भाषा—सब कुछ बदलते हैं। वेशभूषा, रहन-सहन, खानपान की तरह भाषा भी एक जीवंत तत्व है, जो निरंतर परिवर्तित होती है।

भाषा के क्षेत्र में भी यह परिवर्तन सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए। आज की आवश्यकता ऐसी भाषाओं की है जो आधुनिक शिक्षा, तकनीकी ज्ञान, रोजगार के अवसर और वैश्विक संवाद की माँगों को पूरा कर सकें। राजस्थानी भाषा, दुर्भाग्यवश, वर्तमान समय की इन आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं है। यही कारण है कि हम उसके प्रयोग और प्रचार-प्रसार में कमी महसूस कर रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह है कि हमें राजस्थानी को पूरी तरह नकार देना चाहिए। किसी भी भाषा का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मूल्य का अपना महत्व होता है। जो भी किसी समाज, क्षेत्र या व्यक्ति की पहचान और इतिहास से जुड़ा हो उसका संरक्षण होना चाहिए।

राजस्थानी भाषा के संदर्भ में भी यही तर्क लागू होता है। हमें इसे संरक्षित करने, इसके साहित्य को संजोने, और इसके सांस्कृतिक महत्व को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए। और यह कार्य सरकार, सामाजिक संस्थाओं और व्यक्तिगत स्तर पर पहले से ही कुछ हद तक किया जा रहा है—जो सराहनीय है। लेकिन इसे संरक्षित करने का मार्ग सामूहिक स्वीकार्यता और सांस्कृतिक प्रयास के ज़रिए होना चाहिए, न कि राजनीतिक निर्णय या भावनात्मक दबाव के आधार पर।

निष्कर्ष:

राजस्थानी भाषा का इतिहास गौरवशाली रहा है, लेकिन उसकी वर्तमान स्थिति चुनौतियों से भरी है। भाषा की उपयोगिता समय और समाज के अनुसार बदलती है, और उसी के आधार पर किसी भाषा की स्थिति तय होती है। इसलिए राजस्थानी को संरक्षित करने के लिए प्रयास होने चाहिए—साहित्य, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में। लेकिन इसके आधार पर इसे राज्य की आधिकारिक भाषा बनाए जाने की माँग फिलहाल एक तात्कालिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया अधिक है, व्यावहारिक दृष्टिकोण कम। हमें भाषाओं के संरक्षण और उपयोगिता के बीच संतुलन बनाना होगा। राजस्थान में भाषा को लेकर भावनात्मक नहीं, यथार्थवादी दृष्टिकोण की ज़रूरत है—तभी हम हमारे भविष्य को सुरक्षित रख पाएँगे, बिना राज्य को विभाजित किए।

Authors

  • Vishnu Rankawat

    I am the Founder of the Centre for Accountability and Performance (CAP), Rajasthan, and a PhD scholar at the Centre for United States Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.

    My research focuses on “The Use of Social Media in the United States Presidential Elections,” exploring its impact on political communication, voter behavior, and electoral strategies.

    In addition to American politics, my areas of interest include Indian and Rajasthan politics, governance, public policy, and the evolving role of digital platforms in shaping political discourse.


     

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  • My name is Manisha, and I am currently pursuing a master’s degree at JNU. Alongside my preparations for civil service, I have a strong interest in research, particularly in the fields of economics and international relations.

     

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