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सरकार बनाम स्कॉलर्स: राजस्थान में राजसेस टीचिंग एसोसिएट भर्ती पर विरोध के प्रमुख कारण

RAJ CES vacancy
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राजस्थान सरकार ने हाल ही में कॉलेज एजुकेशन सोसाइटी के अंतर्गत नवस्थापित महाविद्यालयों के लिए पाँच वर्ष की अवधि हेतु अस्थायी आधार पर रिक्तियों की घोषणा की है, जिन्हें राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड (RSSB) द्वारा आयोजित परीक्षा के माध्यम से भरा जाना प्रस्तावित है।

हालाँकि, इस घोषणा का अकादमिक समुदाय की ओर से व्यापक विरोध किया जा रहा है। इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है: जब राजस्थान के विश्वविद्यालय और महाविद्यालय पहले से ही शिक्षकों की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं, तो अकादमिक समुदाय स्वयं इन रिक्तियों का विरोध क्यों कर रहा है?

इस लेख में नई Teaching Associate योजना के प्रमुख प्रावधानों की आलोचनात्मक व्याख्या करते हुए इसी महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया गया है। इसमें स्कॉलर्स और अन्य अकादमिक हितधारकों द्वारा व्यक्त सशक्त आपत्तियों के प्रमुख कारणों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

विवादास्पद प्रावधानों के विश्लेषण से पूर्व, इन नवस्थापित महाविद्यालयों के प्रबंधन के लिए उत्तरदायी संस्थागत ढाँचे राजस्थान कॉलेज एजुकेशन सोसाइटी (RAJ-CES) को समझना आवश्यक है।

राजसेस (RAJ-CES) क्या है?

राजस्थान कॉलेज एजुकेशन सोसाइटी (RAJ-CES) की स्थापना वर्ष 2022 में गहलोत सरकार द्वारा की गई। आधिकारिक दावों के अनुसार, इस सोसाइटी का उद्देश्य राजस्थान में उच्च शिक्षा के विस्तार, विकास तथा सुव्यवस्थित प्रबंधन को प्रोत्साहित करना है। सरकार का तर्क है कि RAJ-CES सरकारी महाविद्यालयों में बड़ी संख्या में रिक्त पड़े शिक्षण एवं गैर-शिक्षण पदों को भरने में सहायक सिद्ध होगा।

सोसाइटी का घोषित उद्देश्य महाविद्यालय स्तर पर रिक्तियों की त्वरित पूर्ति करना तथा राज्य में उच्च शिक्षा को सुदृढ़ बनाना है। इसके अंतर्गत सोसाइटी को अपने प्रशासनिक ढाँचे के माध्यम से नवस्थापित महाविद्यालयों की देखरेख करने तथा शिक्षण एवं गैर-शिक्षण दोनों श्रेणियों के पद सृजित करने का अधिकार प्रदान किया गया है।

इसके अतिरिक्त, सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा के गुणवत्ता प्रबंधन को सुनिश्चित करने हेतु RAJ-CES संस्थान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के अनुरूप कार्य करेंगे।

RAJ-CES के उद्देश्य

सोसायटी के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल हैं:

1. राजस्थान में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करना और सार्थक अनुसंधान की संभावनाओं को बढ़ाना।

2. सोसायटी के तहत कॉलेजों की स्थापना, संचालन, रखरखाव और प्रबंधन करना।

3. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में राजस्थान के युवाओं की रोजगार क्षमता को बढ़ाना।

4. विभिन्न शैक्षणिक विषयों में अनुसंधान गतिविधियों को सुविधाजनक बनाना।

5. सोसायटी के तहत कॉलेजों के प्रभावी कामकाज को सुनिश्चित करना।

6. विश्लेषणात्मक और अनुसंधान क्षमताओं को मजबूत करने के लिए सेमिनार, कार्यशालाओं, संगोष्ठियों और सम्मेलनों जैसी शैक्षणिक गतिविधियों का आयोजन करना।

7. राजस्थान के भीतर और बाहर विशिष्ट शैक्षणिक संस्थानों के साथ सहयोग को बढ़ावा देना

8. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार द्वारा सौंपे गए अतिरिक्त उद्देश्यों को पूरा करना।

9. प्रबंधन प्रणाली विकसित करने के लिए जो संकाय उत्कृष्टता, रचनात्मकता, कॉलेजियलिटी, पेशेवर क्षमता, नेतृत्व, शिक्षण के प्रति प्रतिबद्धता और संस्थागत सहयोग को प्रोत्साहित करती है।

इस नवस्थापित राजसेस का तात्कालिक परिणाम विद्या संबल योजना थी।

विद्या संबल योजना: 

RAJ-CES के व्यापक उच्च शिक्षा नीति ढाँचे के अंतर्गत “विद्या संबल योजना” का प्रतिपादन किया गया, जिसका उद्देश्य UGC मानदंडों के अनुरूप वेतन प्रदान करते हुए महाविद्यालयों में अस्थायी आधार पर शिक्षण कार्मिकों की भर्ती करना था। इस योजना को भी शिक्षाविदों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, यद्यपि सरकार ने अंततः इसे लागू कर दिया था।

बाद में राज्य में हुए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन के पश्चात भजन लाल सरकार ने न केवल इस नीति को जारी रखने का निर्णय लिया, बल्कि इसमें अतिरिक्त प्रावधान भी जोड़े। ये संशोधन अत्यधिक विवादास्पद सिद्ध हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप पूरे राजस्थान में अकादमिक समुदाय का विरोध और तीव्र हो गया है।

यद्यपि सरकार इस नीति को रिक्तियों की त्वरित पूर्ति, अनुसंधान समर्थन तथा युवा रोजगार सृजन के एक प्रभावी तंत्र के रूप में प्रस्तुत कर रही है, किंतु अनेक विद्वान इससे आश्वस्त नहीं हैं। उनका असंतोष नीति में निहित संरचनात्मक, आर्थिक तथा शैक्षणिक चिंताओं से उत्पन्न होता है।

विरोध क्यों?

राजसेस टीचिंग एसोसिएट वैकेंसी के खिलाफ विरोध के पीछे ये पांच प्रमुख कारण हैं।

1. नियुक्तियों की अस्थायी प्रकृति

विवाद का सबसे प्रमुख बिंदु टीचिंग एसोसिएट पदों की पूर्णतः अस्थायी प्रकृति है। प्रस्तावित नियुक्तियाँ पाँच वर्ष की अवधि तक सीमित हैं तथा अभ्यर्थियों को चयन हेतु एक प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा।

स्कॉलर्स का तर्क है कि RAJ-CES के अंतर्गत निर्धारित पात्रता मानदंड जिनमें -NET, PhD तथा अन्य शैक्षणिक योग्यताएँ शामिल हैं- मूलतः स्थायी सहायक प्रोफेसर पदों के लिए अपेक्षित मानकों के समतुल्य हैं। यदि योग्यता का स्तर और चयन प्रक्रिया की कठोरता नियमित भर्ती के अनुरूप है, तो स्थायी नियुक्तियों नहीं देने का औचित्य क्या है।

स्कॉलर्स के दृष्टिकोण से यह नीति उच्च योग्य अभ्यर्थियों को प्रत्येक पाँच वर्ष में पुनः परीक्षाओं में सम्मिलित होने के लिए बाध्य कर अनिश्चितता को संस्थागत रूप देती है, जिससे उच्च शिक्षा क्षेत्र में संविदात्मक असुरक्षा और अधिक गहराने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

2. वेतन संरचना और आर्थिक व्यवहार्यता

विरोध का दूसरा प्रमुख कारण ₹28,000 प्रति माह का प्रस्तावित वेतन है। स्कॉलर्स का कहना है कि अभ्यर्थी सामान्यतः स्नातकोत्तर शिक्षा पूर्ण करने, NET/JRF उत्तीर्ण करने तथा पीएचडी प्राप्त करने में लगभग एक दशक व्यतीत करते हैं। ऐसे में उनसे एक अतिरिक्त राज्य-स्तरीय परीक्षा उत्तीर्ण कराने के बाद अपेक्षाकृत अल्प निश्चित पारिश्रमिक प्रदान करना उनकी योग्यता और एक लंबे अकादमिक निवेश के प्रति न्याय नहीं है।

आलोचकों का तर्क है कि यह पारिश्रमिक न तो शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप है और न ही आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है। सरकारी अधिसूचना में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि वेतन एवं सेवा लाभों के संदर्भ में Teaching Associates को नियमित सरकारी कर्मचारियों के समकक्ष नहीं माना जाएगा। यह स्पष्ट रूप से योग्य स्कॉलर्स के विरुद्ध सरकारी संरचनात्मक भेदभाव है।

3. सामाजिक स्थिति और व्यावसायिक गरिमा

विरोध का तीसरा तथा अधिक समाजशास्त्रीय आयाम व्यावसायिक गरिमा से संबंधित है। पीएचडी अर्जित करना एक महत्वपूर्ण बौद्धिक उपलब्धि माना जाता है।

स्कॉलर्स का तर्क है कि लगभग दस वर्षों की उच्च शिक्षा के बाद ₹28,000 की पेशकश उन्नत शैक्षणिक प्रशिक्षण से जुड़े सामाजिक और व्यावसायिक मूल्य को कमजोर करती है। 

उन्हें आशंका है कि यह शिक्षा जगत में करियर पर विचार करने वाली भावी पीढ़ियों को हतोत्साहित करेगा। यह अकादमिक श्रम के दीर्घकालिक अवमूल्यन को लेकर गहरी चिंताओं को प्रतिबिंबित करता है।

4. संभावित प्रतिकूल परिणाम

एक गंभीर आशंका व्यक्त की जा रही है कि इस स्तर का वेतन उच्च गुणवत्ता वाले स्कॉलर्स को आकर्षित करने या उन्हें बनाए रखने में विफल रहेगा। कम वेतन के कारण अनेक नियुक्त शिक्षकों को समानांतर रूप से वैकल्पिक रोजगार की तलाश करनी पड़ेगी, जिससे शिक्षण गुणवत्ता, अनुसंधान उत्पादकता तथा संस्थागत स्थिरता प्रभावित होने की संभावना है।

नीतिगत स्तर पर सरकार इस योजना को व्यावहारिक समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है। किंतु स्कॉलर्स का तर्क है कि किसी नीति का मूल्यांकन उसके उद्देश्य के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संभावित संरचनात्मक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।

अकादमिक दृष्टि से Teaching Associate मॉडल राजस्थान के उच्च शिक्षा ढांचे में एक प्रतिगामी परिवर्तन का जोखिम उत्पन्न कर देगा। अतः यह बहस केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य में उच्च शिक्षा की भावी गुणवत्ता और संस्थागत अखंडता से भी जुड़ी हुई है।

5. पद का नामकरण

विवाद का अंतिम महत्वपूर्ण बिंदु शिक्षण पद के पदनाम में किया गया परिवर्तन है। RAJ-CES ढांचे के अंतर्गत कॉलेज शिक्षण कर्मियों को “सहायक प्रोफेसर” के स्थान पर “Teaching Associates” के रूप में नामित किया गया है।

स्कॉलर्स का तर्क है कि पदनाम में यह बदलाव मात्र शब्दगत नहीं, बल्कि रणनीतिक प्रकृति का है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार सहायक प्रोफेसर नियुक्तियों पर लागू विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के मानदंडों से बचने के लिए इस परिवर्तित पदनाम का उपयोग कर रही है। UGC नियमों के अनुसार अतिथि सहायक प्रोफेसर के लिए न्यूनतम मूल वेतन ₹50,000 निर्धारित है, जबकि Teaching Associates के लिए ₹28,000 प्रति माह तय किया गया है।

इस संदर्भ में आलोचक एक मौलिक प्रश्न उठाते हैं: यदि पात्रता मानदंड, आवश्यक योग्यता (NET/PhD) तथा प्रस्तावित भर्ती परीक्षा व्यापक रूप से सहायक प्रोफेसर के मानकों के समतुल्य हैं, तो एक पूर्णतः नए पदनाम के सृजन का औचित्य क्या है?

स्कॉलर्स के दृष्टिकोण से यह उच्च योग्य शैक्षणिक श्रम को अपेक्षाकृत कम लागत पर उपलब्ध कराने की एक संस्थागत व्यवस्था का संकेत देता है। अनेक लोगों का मानना है कि यह कदम शोधार्थियों द्वारा किए गए दीर्घकालिक शैक्षणिक निवेश को प्रभावी रूप से कमजोर करता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि भारत भर के विश्वविद्यालय लंबे समय से अस्थायी या तदर्थ आधार पर संकाय की नियुक्ति करते रहे हैं; तथापि ऐसे मामलों में भी संस्थान सामान्यतः “सहायक प्रोफेसर” का पदनाम बनाए रखते हैं (अक्सर अतिथि, तदर्थ या संविदात्मक जैसे उपसर्गों के साथ)। इसके विपरीत, RAJ-CES ढांचा एक पूर्णतः नई श्रेणी प्रस्तुत करता है, जिसे अकादमिक समुदाय इन पदों को स्थापित UGC वेतन एवं सेवा मानकों से संरचनात्मक रूप से अलग करने के प्रयास के रूप में देखता है।

अतः अनेक स्कॉलर्स के लिए यह मुद्दा केवल वेतन तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यावसायिक मान्यता, नियामकीय अनुपालन तथा निम्न-स्तरीय समानांतर शैक्षणिक कार्यबल के निर्माण के दीर्घकालिक प्रभावों से भी संबंधित है। यही चिंता इस नीति के विरुद्ध उभरते विरोध के प्रमुख कारकों में से एक बन गई है।

रोजगार बहस: रिक्ति विरोधाभास

RAJ-CES ढांचे के पक्ष में सरकार द्वारा प्रस्तुत प्रमुख औचित्यों में से एक उच्च शिक्षा क्षेत्र में त्वरित रोजगार सृजन का वादा है। तथापि, निकट परीक्षण पर अकादमिक समुदाय इस दावे में एक मौलिक विरोधाभास की पहचान करता है।

आलोचकों का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में बेरोजगारी तथा शिक्षकों की कमी को दूर करने के प्रति प्रतिबद्ध है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि विश्वविद्यालयों और सरकारी महाविद्यालयों में स्थायी रिक्तियां एक दशक से अधिक समय से बड़े पैमाने पर क्यों लंबित पड़ी हैं। उपलब्ध संस्थागत आंकड़ों से संकेत मिलता है कि राजस्थान के अनेक उच्च शिक्षा संस्थान, सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर स्तर पर स्वीकृत संकाय क्षमता के 50% से भी कम पर संचालित हो रहे हैं।

कुछ विशेष रूप से चिंताजनक मामलों जैसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय, सीकर जहाँ स्थायी शिक्षकों की संख्या शून्य हैं। लेकिन पूर्ववर्ती अस्थायी तंत्र जैसे विद्या संबल योजना, जो विशेष रूप से त्वरित रिक्ति पूर्ति के लिए प्रारंभ की गई, के बाद भी ऐसे संस्थानों की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। स्कॉलर्स के अनुसार, ऐसी स्थितियां इस सरकारी दावे की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं कि नई नीति का प्राथमिक उद्देश्य उच्च शिक्षा की क्षमता को सुदृढ़ करना है।

एक अन्य प्रमुख आलोचना प्रक्रियात्मक पुनरावृत्ति से संबंधित है। Teaching Associate भर्ती प्रक्रिया में कथित रूप से ऐसी पात्रता शर्तें और परीक्षा की कठोरता शामिल है, जो स्थायी भर्ती के तुलनीय हैं। अतः स्कॉलर्स का मत है कि समान प्रशासनिक समय, संस्थागत ऊर्जा और सार्वजनिक संसाधनों को नियमित एवं स्थायी नियुक्तियों की दिशा में अधिक प्रभावी ढंग से नियोजित किया जा सकता है। इस दृष्टि से अस्थायी मार्ग न केवल प्रशासनिक रूप से अल्प-कार्यक्षम प्रतीत होता है, बल्कि संरचनात्मक रूप से भी अल्पदर्शी दिखाई देता है।

समग्र रूप से, ये कारक अकादमिक समुदाय के अनेक सदस्यों को RAJ-CES Teaching Associate नीति को रोजगार-सृजन रणनीति की अपेक्षा राजकोषीय सीमाओं और सार्वजनिक उच्च शिक्षा में बढ़ते संविदाकरण की प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया के रूप में देखने के लिए प्रेरित करते हैं।

नीतिगत इरादे का प्रश्न

स्कॉलर्स के एक वर्ग का मानना है कि बड़े पैमाने पर अस्थायी भर्ती का वादा अभ्यर्थियों के बीच यह धारणा पैदा कर सकता है कि संविदात्मक पदों को भविष्य में नियमित कर दिया जाएगा। अनेक शोधार्थी यह सोचते हैं कि वर्तमान भर्ती प्रक्रिया का समर्थन कर बाद में सरकार पर दबाव बनाकर सभी अस्थायी शिक्षकों को स्थायी कराया जा सकता है। किंतु यह अपेक्षा भ्रामक सिद्ध हो सकती है।

विद्या संबल योजना इसका प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत करती है। इस योजना से जुड़े किसी भी शिक्षक को स्थायी नहीं किया गया; बल्कि स्थिति यहाँ तक है कि वर्तमान प्रस्तावित RAJ-CES शिक्षक भर्ती में भी उन्हें अनुभव का कोई विशेष लाभ प्रदान किए जाने का प्रावधान स्पष्ट नहीं है। पूर्ववर्ती गहलोत सरकार द्वारा भी चुनावी संदर्भों में ऐसे किसी आश्वासन के स्पष्ट संकेत नहीं मिलते।

इस परिप्रेक्ष्य में आलोचकों का मत है कि RAJ-CES नीति स्थायी शैक्षणिक संरचना को सुदृढ़ करने के बजाय एक समानांतर एवं अनिश्चित शिक्षण कार्यबल को संस्थागत रूप दे सकती है।

फलतः राजस्थान का एक महत्वपूर्ण अकादमिक वर्ग निरंतर यह मांग कर रहा है कि Teaching Associate योजना को उसके वर्तमान स्वरूप में वापस लिया जाए तथा विश्वविद्यालयों और सरकारी महाविद्यालयों को संरचनात्मक रूप से सुदृढ़ करने हेतु स्थायी पदों पर नियमित भर्ती की जाए।

निष्कर्ष

RAJ-CES Teaching Associate नीति के इर्द-गिर्द उभरा विवाद प्रशासनिक तात्कालिकता और अकादमिक स्थिरता के बीच निहित एक गहरे संरचनात्मक तनाव को उजागर करता है।

जहाँ सरकार इस नीति को शिक्षकों की कमी और युवा बेरोजगारी के त्वरित समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं अकादमिक समुदाय का एक बड़ा वर्ग इसे बढ़ते संविदाकरण, वेतन संपीड़न तथा शैक्षणिक मानकों के दीर्घकालिक क्षरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखता है।

अंततः यह बहस केवल एक भर्ती योजना तक सीमित नहीं है; यह राजस्थान में सार्वजनिक उच्च शिक्षा के भावी स्वरूप को लेकर बुनियादी प्रश्न उठाती है  की क्या उच्च शिक्षा व्यवस्था स्थिर, शोध-उन्मुख अकादमिक करियर पर आधारित होगी, या फिर वह क्रमशः अल्पकालिक और कम सुरक्षा वाली शिक्षण व्यवस्थाओं पर अधिक निर्भर होती जाएगी।

राजसेस भर्ती पर सर्वे

CAP Rajasthan राजसेस टीचिंग एसोसिएट भर्ती पर राय जानने के लिए एक सर्वे कर रहा हैं अगर अभी तक आपने इसको नहीं भरा हैं तो दो मिनट्स का समय निकाल कर इससे जरूर भरे।

सर्वे लिंक

https://caprajasthan.org/cap-survey-on-raj-ces-teaching-associate-vacancy/

Author

  • Vishnu Rankawat

    I am the Founder of the Centre for Accountability and Performance (CAP), Rajasthan, and a PhD scholar at the Centre for United States Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.

    My research focuses on “The Use of Social Media in the United States Presidential Elections,” exploring its impact on political communication, voter behavior, and electoral strategies.

    In addition to American politics, my areas of interest include Indian and Rajasthan politics, governance, public policy, and the evolving role of digital platforms in shaping political discourse.


     

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5 responses

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    splendid analysjs

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    His breakdown of the situation is entirely accurate. It is high time the government takes notice and makes a decision on these matter.

  3.  Avatar
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    सरकार को विद्या संबल योजना के बारे में सोचना चाहिए तथा इनका रोजगार की गारंटी देनी चाहिए , लंबे समय से राजस्थान में उच्च शिक्षा को आगे तक पहुंचाने का पूर्ण तहे दिल से प्रयास किया है अतः इनका इसको लाभ मिलना चाहिए

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    Bhut ache se sab kuch explain kiya gya hai… Well written

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    Anonymous

    राजस्थान सरकार एक और राजनीतिक माहौल तैयार कर रही है कि जो जुझारू और मजबूत तैयारी के साथ नियमित भर्ती का समर्थन कर रहे हैं उनके सामने विद्यासंबल पर कार्य करने वाले बहुत से भर्ती परीक्षाओं से ऊब या विफल हो चुके संविदा कर्मियों को खड़ा करना चाहती है ताकि यहां भी आपसी विरोध में उच्च शिक्षित युवा को उलझाना चाहती है ताकि कुल मिलाकर संविदा सिस्टम को जारी रखा जा सके और कहा जा सके कि युवाओं को संविदा पर काम करने में कोई दिक्कत नहीं है रहे बात मासिक वेतन की तो वह ₹44800 दिया ही जा रहा है।…..बात सोचने की है क्योंकि यह सब युवाओं से भविष्य और अब तक के संघर्ष से जुड़ा विषय है। रही बात विद्या संबल पर काम करने वालों की तो उनको ये सपने दिखाए जा रहे हैं कि कैसे भी हो उनको स्थाई कर ही दिया जाएगा।

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