प्रस्तावना
CAP Rajasthan ने राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की परीक्षा प्रक्रिया की शैक्षणिक गुणवत्ता, पारदर्शिता और निष्पक्षता का आकलन करने के लिए एक सर्वेक्षण आयोजित किया। इस सर्वे में अभ्यर्थियों से परीक्षा प्रणाली के विभिन्न पहलुओं पर प्रश्न पूछे गए, जिससे संस्था की विश्वसनीयता तथा अभ्यर्थियों के अनुभवों को समझा जा सके।
प्रतियोगी परीक्षाओं में विश्लेषणात्मक सोच (Analytical Thinking) का विशेष महत्व है, क्योंकि यही कौशल भविष्य के प्रशासकों को जटिल समस्याओं के समाधान में सक्षम बनाता है। दूसरी ओर, केवल रटकर याद करना (Rote Learning) आलोचनात्मक दृष्टिकोण को बाधित कर सकता है। वर्तमान समय में RPSC जैसी संस्थाओं की परीक्षा प्रणाली की शैक्षणिक दिशा पर यह बहस जारी है कि क्या ये परीक्षाएँ गहन विश्लेषण क्षमताको जाँचती हैं या केवल तथ्यों के रटने को बढ़ावा देती हैं। इसी संदर्भ में सर्वे का प्रश्न संख्या–1 प्रासंगिक है, क्योंकि यह अभ्यर्थियों की दृष्टि में RPSC परीक्षा प्रणाली के शैक्षणिक स्वरूप को उजागर करता है।
प्रश्न 1:
“क्या आपको लगता है कि RPSC की परीक्षा प्रणाली अभ्यर्थियों में विश्लेषणात्मक सोच को बढ़ावा देती है या रटकर याद करने पर निर्भर करती है?”
a. विश्लेषणात्मक सोच को बढ़ावा देती है
b. रटकर याद करने पर अधिक निर्भर करती है
c. दोनों के बीच संतुलन है
d. निश्चित नहीं हूँ
डेटा प्रोफाइल एवं वर्णनात्मक विश्लेषण
सर्वेक्षण में कुल 1008 उत्तरदाताओं (N) ने भाग लिया। प्रश्न 1 के उत्तर चार विकल्पों में विभाजित थे। प्रत्येक विकल्प को चुनने वाले अभ्यर्थियों की संख्या और प्रतिशत नीचे तालिका में प्रस्तुत है:
| विकल्प | संख्या (Number of Responses) | प्रतिशत (%) |
|---|---|---|
| विश्लेषणात्मक सोच | 313 | 31.05 |
| रटने पर निर्भर | 392 | 38.89 |
| संतुलन | 270 | 26.79 |
| निश्चित नहीं | 33 | 3.27 |
| कुल | 1008 | 100 |

- ऊपर दिए गए आँकड़ों के अनुसार लगभग 38.89% प्रतिभागियों का मानना है कि RPSC की परीक्षा प्रणाली रटने पर अधिक निर्भर है, जबकि 31.05% के अनुसार यह विश्लेषणात्मक सोच को बढ़ावा देती है।
- लगभग 26.79% उत्तरदाताओं ने प्रणाली को दोनों के बीच संतुलित बताया। केवल 3.27% प्रतिभागी इस प्रश्न पर निश्चित नहीं थे। यह वितरण दर्शाता है कि अधिकांश अभ्यर्थियों ने परीक्षा की प्रकृति को लेकर स्पष्ट राय बना रखी है।
- उल्लेखनीय है कि सबसे बड़ा समूह परीक्षा को रटंत प्रकृति का मानता है, हालाँकि एक महत्वपूर्ण अनुपात इसे विश्लेषणात्मक या संतुलित भी मानता है।
प्रमुख निष्कर्ष
उपरोक्त वर्णनात्मक विश्लेषण से निम्नलिखित प्रमुख निष्कर्ष सामने आते हैं:
- अभ्यर्थियों का सबसे बड़ा वर्ग (लगभग 39%) RPSC परीक्षा प्रणाली को स्मरण-आधारित या रटकर याद करने पर निर्भर मानता है।
- एक उल्लेखनीय भाग (लगभग 31%) का मानना है कि यह प्रणाली विश्लेषणात्मक सोच को बढ़ावा देती है।
- लगभग 26.8% उत्तरदाताओं के अनुसार परीक्षा प्रणाली दोनों के बीच संतुलन बनाए रखती है।
- केवल लगभग 3% अभ्यर्थी ही इस विषय पर अनिश्चित रहे।
कुल मिलाकर, रुझान यह संकेत देते हैं कि यद्यपि विश्लेषणात्मक सोच को महत्व देने वाले अभ्यर्थियों की संख्या कम नहीं है, फिर भी परीक्षा प्रणाली को रटंत शैली पर अधिक निर्भर समझने वालों की संख्या अधिक है। यह निष्कर्ष RPSC की परीक्षा पद्धति में सुधार की संभावनाओं और उसकी वर्तमान शैक्षणिक दिशा पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
तुलनात्मक विश्लेषण (Cross-Tab Analysis)
नीचे विभिन्न उप-समूहों के अनुसार प्रश्न 1 के उत्तरों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत है। इन तुलनाओं से स्पष्ट होता है कि RPSC परीक्षा प्रणाली की प्रकृति (विश्लेषणात्मक बनाम रटंत) के प्रति अभ्यर्थियों की धारणा अलग-अलग कारकों के अनुसार बदलती है।
1. तैयारी के तरीके के अनुसार तुलना
(कोचिंग बनाम स्व-अध्ययन)
नीचे दी गई तालिका में प्रश्न 1 के उत्तरों का वितरण अभ्यर्थियों के तैयारी के तरीके — कोचिंग संस्थान के माध्यम से बनाम स्व-अध्ययन — के अनुसार प्रतिशत में दर्शाया गया है:
| विकल्प | कोचिंग (%) | स्व-अध्ययन (%) |
|---|---|---|
| रटने पर निर्भर | 36.52 | 39.19 |
| निश्चित नहीं | 2.61 | 3.36 |
| संतुलन | 29.57 | 26.43 |
| विश्लेषणात्मक सोच | 31.30 | 31.02 |

- कोचिंग लेने वाले अभ्यर्थियों में 36.5% ने माना कि परीक्षा प्रणाली रटने पर निर्भर करती है, जबकि स्व-अध्ययन करने वाले अभ्यर्थियों में यह अनुपात थोड़ा अधिक, 39.2%, दर्ज किया गया। विश्लेषणात्मक सोच को प्रोत्साहित करने की धारणा दोनों समूहों में लगभग समान स्तर पर रही (कोचिंग: 31.3%, स्व-अध्ययन: 31.0%)।
- दिलचस्प अंतर “दोनों में संतुलन” वाले उत्तर में दिखाई देता है: कोचिंग प्राप्त समूह में लगभग 29.6% ने परीक्षा को संतुलित बताया, जबकि स्व-अध्ययन समूह में यह आँकड़ा 26.4% रहा। “निश्चित नहीं” उत्तर दोनों समूहों में ही बहुत कम पाए गए (कोचिंग: 2.6%, स्व-अध्ययन: 3.4%)।
- इन अंतरों से संकेत मिलता है कि कोचिंग लेने वाले अभ्यर्थियों का दृष्टिकोण थोड़ा अधिक संतुलित है—वे अपेक्षाकृत कम संख्या में परीक्षा को पूरी तरह रटंत मानते हैं और कुछ अधिक संख्या में संतुलन देखते हैं।
- संभव है कि कोचिंग संस्थानों द्वारा दी गई निर्देशित तैयारी के कारण इनमें परीक्षा पैटर्न की बेहतर समझ हो, जिसके चलते वे परीक्षा में विश्लेषण और स्मरण दोनों के योगदान को पहचानने की प्रवृत्ति रखते हैं।
- दूसरी ओर, स्व-अध्ययन करने वाले अभ्यर्थी कुछ अधिक आलोचनात्मक प्रतीत होते हैं और उनमें परीक्षा को रटने पर निर्भर बताने का अनुपात मामूली रूप से अधिक है। यद्यपि दोनों समूहों में मत विभाजन का समग्र पैटर्न मिलता-जुलता है, फिर भी तैयारी के तरीके के आधार पर धारणा में यह सूक्ष्म अंतर नीतिगत दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है।
2. पारदर्शिता धारणा (Q3) के अनुसार तुलना
(परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता के आकलन के आधार पर)
प्रश्न 1 के उत्तरों का वितरण इस आधार पर भी भिन्न पाया गया कि प्रतिभागी RPSC परीक्षा-प्रक्रिया को कितना पारदर्शी या अपारदर्शी मानते हैं (यह धारणा प्रश्न 3 में मापी गई थी)। पाँच पारदर्शिता-समूहों में प्रश्न 1 के उत्तरों का प्रतिशत नीचे तालिका में दर्शाया गया है:
| विकल्प | अधिकतर पारदर्शी | आंशिक अपारदर्शी | ज़्यादातर अपारदर्शी | पूरी तरह पारदर्शी | बिल्कुल अपारदर्शी |
|---|---|---|---|---|---|
| रटने पर निर्भर | 26.15 | 45.70 | 60.22 | 10.53 | 60.34 |
| निश्चित नहीं | 1.08 | 4.52 | 5.38 | 0.88 | 6.90 |
| संतुलन | 32.35 | 27.60 | 21.51 | 27.19 | 15.52 |
| विश्लेषणात्मक सोच | 40.43 | 22.17 | 12.90 | 61.40 | 17.24 |

- जो प्रतिभागी RPSC परीक्षा-प्रक्रिया को “पूरी तरह पारदर्शी” और जवाबदेह मानते हैं, उनमें बहुमत (61.4%) का यह सोचना है कि परीक्षा प्रणाली विश्लेषणात्मक सोच को बढ़ावा देती है, तथा केवल 10.5% ही इसे रटने पर निर्भर बताते हैं। इसके विपरीत, जो लोग प्रक्रिया को “बिल्कुल अपारदर्शी” मानते हैं, उनमें से 60.3% परीक्षा को रटंत (स्मरण-आधारित) करार देते हैं और केवल 17.2% इसे विश्लेषणात्मक मानते हैं।
- बीच की श्रेणियों में यह क्रमिक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। “अधिकतर पारदर्शी” मानने वाले समूह में लगभग 40.4% विश्लेषणात्मक सोच वाला मत है और 26.1% रटंत वाला, जबकि “ज़्यादातर अपारदर्शी” समूह में केवल 12.9% विश्लेषणात्मक और 60.2% रटंत मत पाए गए।
- इसी प्रकार “आंशिक रूप से अपारदर्शी” मानने वाले प्रतिभागियों में विश्लेषणात्मक सोच (22.2%) की तुलना में रटने पर निर्भरता का मत काफी अधिक (45.7%) रहा।
- स्पष्टतः, पारदर्शिता की धारणा में गिरावट के साथ यह विश्वास बढ़ता है कि परीक्षा प्रणाली रटकर याद करने पर आधारित है, जबकि पारदर्शिता का उच्च स्तर अनुभव करने वाले प्रतिभागी परीक्षा को कहीं अधिक विश्लेषण-उन्मुख देखते हैं।
- यह प्रवृत्ति इंगित करती है कि अभ्यर्थियों की नज़र में RPSC की परीक्षा-पद्धति की बौद्धिक गुणवत्ता संस्था में उनके समग्र विश्वास से गहराई से जुड़ी हुई है।
3. अनुवाद गुणवत्ता (Q8) के अनुसार तुलना
(द्विभाषी प्रश्न-पत्रों के अनुवाद सम्बन्धी अनुभव के आधार पर)
प्रश्न 1 के उत्तरों का विभाजन इस आधार पर भी किया गया कि प्रतिभागी ने RPSC परीक्षाओं में अनुवाद की गुणवत्ता (प्रश्न 8) के बारे में क्या राय दी थी। जिन अभ्यर्थियों ने माना कि परीक्षाओं में हिंदी–अंग्रेज़ी अनुवाद त्रुटि-रहित और सही रहता है, बनाम जिनके अनुसार अनुवाद में अक्सर गलतियाँ होती हैं, इन समूहों में परीक्षा प्रणाली की धारणा नीचे तालिका में दर्शाई गई है:
| विकल्प | अनुवाद गलत | निश्चित नहीं | अनुवाद सही |
|---|---|---|---|
| रटने पर निर्भर | 49.07 | 45.45 | 27.67 |
| निश्चित नहीं | 3.50 | 3.31 | 3.05 |
| संतुलन | 22.90 | 24.79 | 30.94 |
| विश्लेषणात्मक सोच | 24.53 | 26.45 | 38.34 |

- जिन प्रतिभागियों ने कहा कि “अनुवाद में अक्सर गलती होती है”, उस समूह में लगभग 49.1% ने RPSC परीक्षा को रटने पर निर्भर बताया और मात्र 24.5% ने इसे विश्लेषणात्मक माना। इसके विपरीत, “अनुवाद सही रहता है” मानने वाले अभ्यर्थियों में परीक्षा प्रणाली को विश्लेषणात्मक कहने वालों का अनुपात अधिक (38.3%) पाया गया, जबकि इस समूह में 27.7% ही इसे रटंत मानते हैं।
- जो प्रतिभागी अनुवाद गुणवत्ता को लेकर “निश्चित नहीं” थे, उनकी धारणा भी नकारात्मक अनुभव वाले समूह से मिलती-जुलती रही — इस उपसमूह में 45.5% ने परीक्षा को रटने पर निर्भर कहा और 26.5% ने विश्लेषणात्मक माना।
- इन तुलनाओं से यह प्रवृत्ति उभरती है कि परीक्षा से संबंधित जिस समूह का अनुभव जितना नकारात्मक (जैसे अनुवाद में त्रुटियाँ देखना) होता है, वह उतना ही परीक्षा को रटंत और गैर-विश्लेषणात्मक मानने की ओर अग्रसर होता है। इसके विपरीत, जिनका परीक्षात्मक अनुभव सकारात्मक होता है (जैसे अनुवाद सही मिलना), वे अधिक संख्या में मानते हैं कि परीक्षा प्रणाली विश्लेषण और चिंतन को प्रोत्साहित करती है।
- यह परिदृश्य दर्शाता है कि परीक्षाओं की प्रक्रियागत विश्वसनीयता अभ्यर्थियों की नज़र में परीक्षा के शैक्षणिक स्तर की धारणा को गहराई से प्रभावित करती है अर्थात जब परीक्षा-प्रक्रिया में त्रुटियाँ दिखती हैं, तो अभ्यर्थी उसकी बौद्धिक गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगाने लगते हैं।
व्याख्या एवं निहितार्थ (Interpretation & Implications)
- प्रश्न 1 के परिणामों का समग्र विश्लेषण स्पष्ट करता है कि वर्तमान RPSC परीक्षा प्रणाली को लेकर अभ्यर्थियों के बीच एक धारणागत विभाजनमौजूद है, जिसमें एक बड़ा समूह इसे स्मृति-आधारित (rote-based) मानता है। यदि वास्तव में परीक्षा प्रणाली रटकर याद करने पर अधिक बल दे रही है, तो इसके व्यापक शैक्षणिक और प्रशासनिक निहितार्थ चिंताजनक हो सकते हैं। ऐसे परीक्षा-पर्यावरण में अभ्यर्थी तर्कशक्ति और समस्या-समाधान कौशल विकसित करने की बजाय तथ्यात्मक जानकारियों को याद रखने पर अधिक ज़ोर देंगे, जिसका प्रभाव उनके सीखने के तरीके और बौद्धिक विकास पर पड़ेगा। इससे चयनित प्राधिकारियों की प्रभावी निर्णय क्षमता तथा नवाचार करने की योग्यता सीमित रह सकती है, क्योंकि उनकी प्रतिभा का मूल्यांकन विश्लेषणात्मक योग्यता के आधार पर नहीं हुआ होगा।
- लंबी अवधि में, प्रशासनिक प्रणाली की गुणवत्ता पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है—रटंत अभ्यास से चुने गए अधिकारी नीति-निर्माण या जमीनी समस्याओं के समाधान में उतनी दक्षता नहीं दिखा पाएँगे, जितनी एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से चयनित प्रतिभागी दिखा सकते थे।
- दूसरी ओर, परिणाम यह भी दर्शाते हैं कि सभी अभ्यर्थी परीक्षा को केवल नकारात्मक रूप में नहीं देखते; लगभग एक-तिहाई अभ्यर्थियों को व्यवस्था में विश्लेषणात्मक तत्व या कम से कम संतुलन दिखाई देता है। यह संकेत करता है कि RPSC की परीक्षाओं में कुछ हद तक उच्च-स्तरीय कौशल की परख शामिल है, या कम से कम ऐसे अभ्यर्थी हैं जो अपने अनुभव के आधार पर परीक्षा को केवल याददाश्त-आधारित नहीं मानते। संभव है कि विभिन्न विषयों या परीक्षा चरणों (प्रारंभिक/मुख्य) में प्रश्नों का स्वरूप भिन्न होने के कारण भी यह मिश्रित राय बनती हो।
- गौरतलब है कि अभ्यर्थियों की धारणा संस्था की प्रक्रियाओं में उनके विश्वास से प्रभावित होती दिखाई देती है। पारदर्शिता और अनुवाद गुणवत्ता जैसे कारकों के साथ प्रश्न 1 के उत्तरों का सहसंबंध यह संकेत करता है कि जहाँ अभ्यर्थी RPSC पर भरोसा करते हैं, वहाँ वे इसकी परीक्षा-पद्धति को भी अधिक गुणवत्तापूर्ण (विश्लेषणमुखी) मानने की प्रवृत्ति रखते हैं, जबकि संस्थागत अविश्वास की स्थिति में परीक्षाओं की निष्पक्षता ही नहीं, उनकी शैक्षणिक कठोरता पर भी संदेह किया जाता है। इस खोज का निहितार्थ यह है कि यदि आयोग अपनी प्रक्रियाओं में सुधार करता है और अभ्यर्थियों का विश्वास अर्जित करता है, तो संभव है कि परीक्षाओं को लेकर “रटंत बनाम विश्लेषणात्मक” की धारणा भी सकारात्मक दिशा में परिवर्तित हो।
- कुल मिलाकर, प्रश्न 1 के परिणाम RPSC परीक्षा प्रणाली में संभावित सुधार की ओर संकेत करते हैं। यदि बड़ी संख्या में प्रतिभागी इसे रटने पर आधारित मानते हैं, तो आयोग की प्रतिष्ठा एक आधुनिक, मेरिट-आधारित चयन प्रक्रिया के रूप में प्रभावित हो सकती है। यह स्थिति शिक्षा-नीति के व्यापक उद्देश्यों—जैसे 21वीं सदी के कौशल (विश्लेषणात्मक सोच, रचनात्मकता, निर्णय क्षमता) को बढ़ावा देना—के भी विपरीत जा सकती है। ऐसे में, परीक्षा प्रणाली में आवश्यक परिवर्तन न केवल अभ्यर्थियों के लिए समान अवसर और उचित आकलन सुनिश्चित करेंगे, बल्कि प्रशासनिक सेवाओं में अधिक सक्षम और कुशल व्यक्तियों के चयन में भी सहायक होंगे।



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