Public Opinion Survey — Recognition of the Rajasthani Survey on: Rajasthani Take Survey →
An independent research organisation

226 पद, 6 सफल उम्मीदवार: RPSC राजनीति विज्ञान भर्ती का सच

वैसे जुलाई का महीना उम्मीदें व आशाओं के मिलन का होता हैं।अक्सर इस समय,भौगोलिक रूप से राजस्थान शुष्क व वर्षा ऋतु के प्रारम्भ के साथ उम्मीद का अपना नया पाठ लिखता हैं। वही दूसरी तरफ,इसी महीने के शुरुआत में एक युवा वर्ग अपनी रिजुता,मेहनत व बाहरी दुनिया के षड्यंत्र से अनभिज्ञ होकर, अपनी क्षमता व कौशल का लोहा बिखरने में व्यस्त था। क्योंकि इस समय स्कूल लेक्चर के एग्जाम चल रहे थे।

RPSC पिछले एक साल से अपनी एक नई कार्यशैली के साथ कार्य कर रही है। जो स्वागत योग्य हैं। अपने आप को पारदर्शी व विश्वसनीय के मापदंड पर कसने का भी प्रयास हैं। लेकिन, इसके साथ परीक्षा पैटर्न व चयन प्रक्रिया में कुछ नवाचार भी करने का प्रयास भी कर रही हैं।

इसी दरमियान, राजनीति विज्ञान, स्कूल लेक्चर 2024, का पेपर 226 पद के लिए,06 जुलाई 2025 को दो पारियों में आयोजित हुआ। जिसमें पहली पारी राजस्थान जीके व दूसरी पारी विषय से संबंधित यानि राजनीति विज्ञान का प्रश्न पत्र हुआ; यहां तक कुछ नया नहीं है, क्योंकि ऐसा अक्सर होता हैं। एक दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें 85502 candidate ने दाखिला भरा, इसमें से 52000 से ज्यादा शामिल हुए।

23 सितम्बर 2025 को परिणाम जारी हुआ, उसमें से सिर्फ़ 06 कैंडिडेट ही एग्जाम क्वालीफाई करने योग्य सिद्ध हुए। इसका मुख्य कारण RPSC द्वारा निर्धारित 40% न्यूनतम मार्क्स हैं।

40% क्या व क्यों?

पिछली सरकार ने वर्ष जुलाई 2021 में, मंत्रिमंडल के निर्णय से शिक्षा विभाग के कार्मिकों के सेवा नियमों में एकरूपता लाने और सरलीकरण के मकसद से राजस्थान शैक्षिक (राज्य एवं अधीनस्थ) सेवा नियम 2021 में संशोधन किया।

इस नियम के मुताबिक अब शिक्षा विभाग के लिए आयोजित प्रतियोगी परीक्षा में अब अगर माइनस अंक आएंगे तो शिक्षक नहीं बन सकेंगे। परीक्षा में न्यूनतम 40 फीसदी अंक हासिल करने होंगे। इसी का असर इस भर्ती पर पड़ा।

40% मार्क्स क्यों ?

शिक्षा विभाग में, शिक्षक बनने हेतु मुख्यतया परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक भर्ती हेतु अलग-अलग पाठ्यक्रम और नंबर भार हैं।

उदाहरण, स्कूल लैक्चर के लिए दो पेपर होते हैं। इनमें एक राजस्थान जीके का पेपर जो 100 प्रश्नों के साथ 200 नम्बर का भार रखता है, वही विषय संबंधित पेपर 150 प्रश्नों के साथ 300 नंबर का वेटेज कैरी करता हैं।

इन्हीं सम्यक योगफल 200+300=500 में 40% टोटल यानि 200/500 तथा प्रत्येक पेपर 36% यानि 72/200 व 108/300 न्यूनतम नम्बर लाना अर्हता हैं।

ऐसा नियम क्यों ?

सरकार के नोटिफिकेशन के अनुसार, इसका मुख्य कारण शिक्षा में पारदर्शिता, गुणवता व क्षमता बढ़ाना हैं। हाल ही में, भजनलाल सरकार ने केवल SC व ST को 5% छुट भी दी हैं।

मुख्य मुद्दा :- राजनीति विज्ञान में 2.6% स्टूडेंट ही सफल क्यों ?

226 पदीय भर्ती में केवल 6 अभ्यर्थी ही सफल हुए। यानि 2.66%। इसका सीधा कारण ,जैसा कि उपरोक्त 36% & 40% नियम का उल्लेख किया; यही इसका मुख्य कारण हैं।

Also Read  Survey -02: RPSC सिलेबस (पाठ्यक्रम) के डिज़ाइन पर अभ्यर्थियों की राय

जब से रिजल्ट जारी हुआ हैं। तब से कई विषमताओं से भरे पर्सपेक्टिव आ रहे हैं। जिसमें मुख्यतय तीन आयाम शामिल हैं; RPSC का गलत पेपर निर्माण का रवैया, कोचिंग इंडस्ट्री पर स्टूडेंट्स का एकतरफा विश्वास, छात्रों का विषय के प्रति परख व समझ का अभाव।

1. RPSC व पेपर निर्माण:-

RPSC नोटिफिकेशन के साथ ही पाठ्यक्रम भी जारी करती हैं। जिसमें स्कूल लेक्चर के लिए परास्नातक तक का ज्ञान अपेक्षा भी करती है। इसी को पेपर निर्माण में आधार बनाती हैं। जब मैने बारीकी से पेपर का अध्ययन किया,उस समय पूरा प्रश्न पत्र पाठ्यक्रम के अनुसार व समान अंकभारित के साथ था

इसके साथ ही मैने पिछली भर्ती का भी पेपर देखा, जिसमें सिर्फ एक अंतर पाया; भाषा का। पिछला पेपर सीधा व सपाट था। लेंदी भी नहीं था। लेकिन इस बार पेपर लेंदी व शब्दों के जाल से प्रेरित था। पेपर निर्माण को दो कारकों में विभाजित करते है।

पहला कारक, टोटल क्वेश्चन व लेवल तथा दूसरा प्रश्नों का नेचर या स्वरूप। पहला कारक ,इसमें 150 क्वेश्चंस मे से 44 क्वेश्चंस RBSE व NCERTs की राजनीति विज्ञान बुक्स आधारित थे। हां, यह बात अलग हैं कि कुछ प्रश्नों में, कुछ नई बात जोड़कर प्रश्न को मोड़ दिया। लेकिन इस बात पर स्तर वही रहता है। बाकी 106 क्वेश्चन में से लगभग 10-10 प्रश्न करेंट अफेयर्स व Teaching Pedagogy,Aptitude & ICT बेस्ड थे। बाकी 86 प्रश्न में से 50 प्रश्न स्नातक स्तर के थे। 36 प्रश्न परास्नातक स्तर के थे। ऐसा पूर्व में आयोजित भर्तियों में भी हुआ था।

दूसरा कारक,प्रश्नों का स्वरूप कैसा था ? पेपर के स्तर के अलावा, स्वरूप का आकलन भी करना जरूरी हैं। वैसे पेपर, पुराने ढंग पर आधारित ही था। लेकिन इस बार एक नया प्रयोग किया। भाषा शैली को गहन व विस्तृत कर दिया । जिसके चलते पेपर एक अलग पैमाने पर चला गया।

मुख्यतया, पेपर के स्वरूप में एक लाइनर (10%), दो लाइनर(35%), पहचान आधारित (5%)व अवधारणात्मक स्वरूप (50%) शामिल था। इन्हीं दो आयाम के आधार पर कह सकते हैं, पेपर पाठ्यक्रम आधारित तथा रूपरेखा में था। पेपर निर्माण नियम व तय सीमा में था।

2. कोचिंग vs RPSC

विद्यार्थी कोचिंग में क्या पढ़ता हैं, उनके मेंटर्स क्या कहते है। इस बात को RPSC फॉलो नहीं करती हैं। RPSC अपने आप में एक संवैधानिक बॉडी हैं। इसका एक निश्चित कार्यक्षेत्र है, जिसमें स्वतंत्र भी हैं।

RPSC में विशेषज्ञ व मनोवैज्ञानिक रूप से कार्य होता होगा क्योंकि पेपर के माध्यम से इस बात का अनुमान लगाया जा सकता हैं। फिर, RPSC को भला या बुरा कहना समाधान भी नहीं है। क्योंकि इसके नियम व शर्तें स्पष्ट भी हैं। इसी आधारित,अभी तक कार्यपद्धति भी हैं।

Also Read  Behavioural Economics and Development: Why Policy Works Differently on the Ground  

वही दूसरी ओर, कोचिंग इंडस्ट्री अपनी जिम्मेदारी से भागने, अपनी दिखाए वादों से मुख मोड़ने के लिए तथा स्टूडेंट्स को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने की कोशिश में, कुछ गतिविधियों का सहारा ले रही हैं, तो इसका यह समाधान कतई नहीं हो सकता हैं। अच्छी बात यही हो सकती है कि अपने नए मानक बनाकर, कुछ नए प्रयोग के साथ, पढ़ने व पढ़ाने के आयाम विकसित करें।

3. स्टूडेंट्स व RPSC का प्रयोग।

एक अच्छी बात याद आ रही हैं ”खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है” आजकल बढ़ती मुनाफे व प्रसिद्धि के चक्कर में,बिना विश्लेषण के अध्यापन शैली विद्यार्थियों के हितों में एक सेंधमारी हैं।

आजकल प्रतिस्पर्धा व कोचिंग के युग्म में, विद्यार्थी भावनावश, किसी के प्रभाव में आने के कारण, अपनी क्षमताओं व कौशल को भूलकर,अपने आप को किसी ऐसे के प्रति समर्पित कर देता हैं, जो स्वयं फैक्चुअल इन्फॉर्मेशन के अलावा परीक्षा के ढंग से अनभिज्ञ हैं। इसी भुलभुलैया मार्ग में, इस तरीके के पेपर का सामना भी करना पड़ सकता हैं। अब जरूरी है, RPSC के बदलते ट्रेंड व स्वरूप को समझकर, के अनुसार तैयारी करनी की।

अब इसका क्या समाधान

समाधान हमेशा नेचुरल समस्या का होता हैं। लेकिन यह मुद्दा, सेंधमारी का हैं। इसका हल सर्तकता व आत्मनिर्भरता से हैं। प्रतिभागियों को समझना पड़ेगा कि अपनी स्वयं की लकीर, स्वयं से ही बढ़ेगी। इसके अलावा समाधान जैस धरना देना या न्यायालय में जाना या भला- बुरा कहना बेतुकी बाते हैं। इसका समाधान कभी-भी इन बातों से नहीं हो सकता।

अब आगे क्या

मैने कुछ महीने पहले RPSC के नए मेंबर कर्नल केसरी सिंह जी का इंटरव्यू देखा था, उसमें उन्होंने जिक्र किया कि आगामी भर्तियों में गुणावता, उत्कृष्टता तथा पारदर्शिता लेकर आयेंगे। इस बात से संकेत हैं कि RPSC कुछ प्रयोग पर प्रयासरत हैं। जिसका परिणीति इस साल की RAS 2024 से लेकर स्कूल लेक्चर भर्ती पर परिलक्षित हैं। एक सदमार्ग यही हो सकता है कि हम अपने पढ़ने के तौर तरीके बदले। रोचकता लेकर आए। ज्ञान संवर्धन के साथ व्यावहारिकता रखें। सम्यक रूप से पढ़ने की कला की ओर अग्रसर होने की आवश्यकता हैं।

Author

  • Praveen K. K. Rajpurohit

    Praveen K. K. Rajpurohit, an alumnus of Rajasthan University with an M.A. in Political Science and a NET qualification, is engaged in understanding the ever-changing dynamics of global politics.

    His interest lies in International Politics, Diplomacy, and National Security.


     

    View all posts

Leave a Comment

Subscribe

Discover more from CAP Rajasthan

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading